वसई पश्चिम में गुरुद्वारे के समीप स्थापित मां भवानी की प्रतिमा आकर्षण का केंद्र; हवनात्मक महायज्ञ, 108 परिक्रमा और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन
वसई |
वसई पश्चिम में गुरुद्वारे के समीप स्वस्तिक सेवा संस्था की ओर से शारदीय नवरात्रि के अवसर पर लगातार नौवें वर्ष दुर्गोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस अवसर पर मां भवानी की भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है। आयोजन में प्रतिदिन पूजा-अर्चना, हवनात्मक महायज्ञ, आरती और महाभंडारे के साथ भजन संध्या, माता की चौकी तथा कीर्तन जैसे धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
आयोजकों के अनुसार, नवरात्रि के दौरान पालघर जिले के विभिन्न क्षेत्रों के अलावा मुंबई और आसपास के इलाकों से भी श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। इस आयोजन में गरबा और डांडिया के बजाय वैदिक अनुष्ठानों और धार्मिक गतिविधियों पर विशेष ध्यान दिया गया है।
हवनात्मक महायज्ञ और वैदिक अनुष्ठानों पर विशेष जोर
दुर्गोत्सव के दौरान मुख्य यज्ञाचार्य राधाकृष्ण जी महाराज और अन्य पंडितों की उपस्थिति में मां भवानी की पूजा-अर्चना के बाद हवनात्मक महायज्ञ संपन्न कराया जाता है। इसके बाद आरती और अन्य धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। श्रद्धालु पूजा-अर्चना के साथ धार्मिक प्रवचनों में भी भाग लेते हैं।
मां भवानी की प्रतिमा की साज-सज्जा और धार्मिक अनुष्ठानों को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। आयोजन में भजन संध्या, माता की चौकी और कीर्तन के माध्यम से श्रद्धालुओं को धार्मिक गतिविधियों में शामिल होने का अवसर मिल रहा है।
108 परिक्रमा और विशेष आरती में शामिल हो रहे श्रद्धालु
स्वस्तिक सेवा संस्था के दुर्गोत्सव में 108 परिक्रमा को विशेष स्थान दिया गया है। श्रद्धालु मां भवानी के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करने और मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना के साथ परिक्रमा करते हैं। कुछ भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने के बाद भी दर्शन और परिक्रमा के लिए पहुंचते हैं। मनोकामना पूर्ण होने से जुड़े अनुभव व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं।
आयोजन के दौरान सुहागिन महिलाओं की विशेष आरती और 108 कन्याओं की आरती भी की जाती है। इन धार्मिक गतिविधियों में श्रद्धालु उत्साहपूर्वक भाग ले रहे हैं।
प्रतिदिन 3 से 5 हजार लोगों के लिए महाभंडारे की व्यवस्था
स्वस्तिक सेवा संस्था के अनुसार, संस्था से जुड़े भक्तों और दानदाताओं के सहयोग से प्रतिदिन लगभग 3,000 से 5,000 श्रद्धालुओं के लिए महाभंडारे की व्यवस्था की जाती है। धार्मिक अनुष्ठानों के बाद श्रद्धालु महाभंडारे का प्रसाद ग्रहण करते हैं।
आयोजकों के मुताबिक, महाभंडारा दुर्गोत्सव का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके संचालन में संस्था के सहयोगियों और दानदाताओं की भूमिका रहती है। पूजा-अर्चना के साथ श्रद्धालुओं को प्रसाद उपलब्ध कराने की यह व्यवस्था पूरे आयोजन के दौरान जारी रहती है।
धार्मिक प्रवचनों में मंत्रोच्चार और भक्ति के महत्व पर चर्चा
मुख्य यज्ञाचार्य राधाकृष्ण जी महाराज और अन्य पंडित धार्मिक अनुष्ठानों के साथ प्रवचन भी देते हैं। इनमें मां भवानी की आराधना, मंत्रोच्चार और देवी स्तुति के महत्व पर चर्चा की जाती है। प्रवचनों में ‘नमस्तुते’ शब्द के अर्थ और उसके धार्मिक संदर्भ को भी समझाया जाता है।
धार्मिक परंपरा में ‘नमस्तुते’ नमन और वंदना से जुड़ा शब्द है, जबकि हवन के दौरान आहुति अर्पित करते समय ‘स्वाहा’ का उच्चारण किया जाता है। आयोजन में हवनात्मक महायज्ञ और महाभंडारे को पूजा तथा सेवा से जोड़कर देखा जाता है।
व्यक्तिगत प्रचार के बजाय सामूहिक सहयोग पर जोर
स्वस्तिक सेवा संस्था के दुर्गोत्सव की एक अन्य विशेषता पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के व्यक्तिगत प्रचार को सीमित रखने का प्रयास है। आयोजन स्थल पर दानदाताओं के बैनर दिखाई देते हैं, लेकिन संस्था के अनुसार पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के नाम तथा तस्वीरों को प्रमुखता से प्रदर्शित नहीं किया जाता। निमंत्रण पत्र में भी अध्यक्ष का नाम प्रमुखता से नहीं दिया जाता।
संस्था से जुड़े लोगों का कहना है कि आयोजन का उद्देश्य किसी व्यक्ति या पद का प्रचार करना नहीं, बल्कि सामूहिक सहयोग से धार्मिक कार्यक्रमों और सेवा गतिविधियों का संचालन करना है। इस कार्यशैली में नाम और पद की अपेक्षा सहयोग को महत्व देने की बात कही जाती है।
नौ वर्षों से जारी है दुर्गोत्सव की परंपरा
स्वस्तिक सेवा संस्था पिछले नौ वर्षों से वसई पश्चिम में शारदीय नवरात्रि के दौरान दुर्गोत्सव आयोजित कर रही है। इस वर्ष भी मां भवानी की प्रतिमा की स्थापना के साथ पूजा-अर्चना, हवनात्मक महायज्ञ, 108 परिक्रमा, विशेष आरती और महाभंडारे के कार्यक्रम जारी हैं।
आयोजकों के अनुसार, भक्तों और दानदाताओं के सहयोग से इन धार्मिक गतिविधियों का संचालन किया जा रहा है। नवरात्रि के दौरान यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु मां भवानी के दर्शन करने के साथ विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों में हिस्सा ले रहे हैं।
इस तरह स्वस्तिक सेवा संस्था का दुर्गोत्सव देवी उपासना, धार्मिक परंपराओं और सामूहिक सहयोग से संचालित महाभंडारे के माध्यम से श्रद्धालुओं को एक साथ जोड़ रहा है।
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