अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस पर वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान, स्वास्थ्य और गरिमापूर्ण जीवन पर जोर
ऋतुपर्ण दवे
बुजुर्ग हमारे परिवार और समाज की गरिमा, शान और धरोहर हैं। उनका जीवन अनुभव और ज्ञान आने वाली पीढ़ियों को दिशा देने का महत्वपूर्ण माध्यम है। समाज में उनकी भूमिका केवल परिवार के वरिष्ठ सदस्य तक सीमित नहीं है, बल्कि वे सामाजिक, नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों के महत्वपूर्ण वाहक भी हैं।
आज जब परिवारों की व्यस्तता बढ़ रही है और सामाजिक दूरी की स्थितियां भी देखने को मिल रही हैं, ऐसे में वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल, सुरक्षा और सम्मान की जिम्मेदारी और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
वरिष्ठ नागरिकों के योगदान, अधिकारों और गरिमापूर्ण जीवन के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से हर वर्ष 1 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 14 दिसंबर 1990 को इस दिवस को मनाने का निर्णय लिया था और पहली बार 1 अक्टूबर 1991 को अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस मनाया गया।
यह दिन केवल औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित रहने के बजाय स्वस्थ, सक्रिय और सम्मानजनक वृद्धावस्था को लेकर गंभीर चर्चा का अवसर भी है।
अस्पतालों में आज भी ऐसे बुजुर्ग दिखाई देते हैं जो 70-80 वर्ष की उम्र में अकेले इलाज कराने पहुंचते हैं, अपनी दवाइयों का समय स्वयं संभालते हैं और कई बार परिवार को परेशान न करने की सोचकर अपनी तकलीफ को कम करके बताते हैं। ऐसी परिस्थितियां परिवार और समाज दोनों के लिए आत्ममंथन का विषय हैं।
बढ़ रही है बुजुर्ग आबादी
इस वर्ष की थीम “द एज ऑफ लॉन्गेविटी: रीथिंकिंग सिस्टम्स फॉर लॉन्गर लाइव्स” यानी “दीर्घायु का युग: लंबी उम्र के लिए प्रणालियों पर पुनर्विचार” है।
बढ़ती जीवन प्रत्याशा के साथ दुनिया में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या भी बढ़ रही है। ऐसे में स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा, पारिवारिक सहयोग और बुजुर्गों के अनुकूल सार्वजनिक व्यवस्थाओं को मजबूत करना महत्वपूर्ण हो गया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 2020 में दुनिया में 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों की संख्या करीब एक अरब थी। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के मुताबिक आने वाले दशकों में यह संख्या काफी बढ़ सकती है और 2050 तक वैश्विक स्तर पर 60 वर्ष या उससे अधिक आयु की आबादी करीब 2.1 अरब तक पहुंचने का अनुमान है।
भारत में भी वरिष्ठ नागरिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यह बदलाव स्वास्थ्य व्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा और परिवारों की जिम्मेदारियों के सामने नई चुनौतियां रखता है, वहीं वरिष्ठ नागरिकों के अनुभव और क्षमताओं को समाज की प्रगति में उपयोग करने के अवसर भी पैदा करता है।
स्वास्थ्य के साथ सम्मान भी जरूरी
बढ़ती उम्र के साथ उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हड्डियों और जोड़ों से जुड़ी समस्याएं, ऑस्टियोपोरोसिस, हृदय रोग, दृष्टि एवं श्रवण संबंधी परेशानियां और संज्ञानात्मक बदलाव जैसी स्वास्थ्य समस्याएं सामने आ सकती हैं। कुछ वरिष्ठ नागरिकों को अवसाद, अकेलेपन और सामाजिक अलगाव जैसी परिस्थितियों का भी सामना करना पड़ सकता है।
ऐसे में नियमित स्वास्थ्य जांच, समय पर चिकित्सकीय परामर्श, आवश्यक उपचार, मानसिक स्वास्थ्य सहयोग और परिवार तथा समाज से सामाजिक जुड़ाव महत्वपूर्ण हैं।
वरिष्ठ नागरिकों के लिए स्वस्थ वातावरण का अर्थ केवल बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना नहीं है। उनके निर्णयों का सम्मान करना, उनकी बात सुनना, उनकी जरूरतों को समझना और उन्हें परिवार तथा समाज का सक्रिय हिस्सा बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
अनुभव समाज की अमूल्य पूंजी
अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस हमें यह याद दिलाता है कि बुजुर्ग केवल देखभाल के पात्र नहीं हैं। उनके पास दशकों का अनुभव, जीवन की सीख और सामाजिक परिस्थितियों को समझने की क्षमता होती है। परिवार और समाज इस अनुभव से सीख लेकर नई पीढ़ी को बेहतर दिशा दे सकते हैं।
बुजुर्गों का सम्मान किसी एक दिन का औपचारिक कार्यक्रम नहीं होना चाहिए। यह परिवार की रोजमर्रा की संस्कृति और समाज के व्यवहार का हिस्सा होना चाहिए।
बढ़ती उम्र जीवन की यात्रा का स्वाभाविक चरण है। इसलिए वरिष्ठ नागरिकों के लिए ऐसा वातावरण बनाना जरूरी है, जहां उन्हें स्वास्थ्य, सुरक्षा, अपनापन और सबसे महत्वपूर्ण सम्मान के साथ जीने का अधिकार मिले।
अंतर्राष्ट्रीय वृद्ध दिवस का संदेश भी यही है—वरिष्ठ नागरिकों को केवल उम्र के आधार पर नहीं, बल्कि उनके अनुभव, योगदान और मानवीय गरिमा के साथ देखा जाए।












