पारंपरिक तालाबों में पर्यावरणपूरक प्रतिमाओं के लिए सुरक्षित व्यवस्था की मांग, सीवेज और औद्योगिक प्रदूषण पर भी कार्रवाई का आग्रह
वसई-विरार। गांवकी और स्थानीय पारंपरिक तालाबों में गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन को लेकर जारी बहस के बीच भूमिपुत्र फाउंडेशन के अध्यक्ष सुशांत श्रीकांत पाटील ने प्रशासन की विसर्जन नीति पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने मांग की है कि पर्यावरण संरक्षण के साथ स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को भी ध्यान में रखते हुए विसर्जन के लिए व्यावहारिक व्यवस्था तैयार की जाए।
पाटील ने सवाल उठाया कि यदि जलप्रदूषण को रोकना प्रशासन की प्राथमिकता है, तो नदियों और खाड़ियों में पूरे वर्ष कथित रूप से छोड़े जाने वाले सीवेज, औद्योगिक प्रदूषित पानी और कचरे पर भी प्रभावी कार्रवाई की जानी चाहिए।
पारंपरिक तालाबों से ग्रामीणों का जुड़ाव
सुशांत पाटील के अनुसार, गांवकी के पारंपरिक तालाबों का स्थानीय ग्रामीणों के साथ धार्मिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक जुड़ाव रहा है। उनका कहना है कि कई स्थानों पर इन जलस्रोतों में वर्षों से गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन होता आया है।
उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण जरूरी है, लेकिन विसर्जन पर कोई भी व्यवस्था लागू करने से पहले स्थानीय लोगों, गणेशोत्सव मंडलों और पर्यावरण विशेषज्ञों के साथ चर्चा की जानी चाहिए।
वहीं, मौजूदा व्यवस्था की पृष्ठभूमि में यह भी उल्लेखनीय है कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2026 के गणेशोत्सव के लिए छह फीट तक की प्रतिमाओं को कृत्रिम जलस्रोतों में विसर्जित करने संबंधी व्यवस्था जारी रखी है।
पारंपरिक तालाबों के संरक्षण का सुझाव
पाटील ने सुझाव दिया कि कृत्रिम विसर्जन तालाबों की व्यवस्था पर होने वाले खर्च का एक हिस्सा गांवकी के पारंपरिक तालाबों के संरक्षण, गाद निकालने, सौंदर्यीकरण, सुरक्षित विसर्जन क्षेत्र तैयार करने और विसर्जन के बाद तत्काल सफाई पर भी खर्च किया जा सकता है।
उनका कहना है कि इससे स्थानीय परंपराओं को बनाए रखने के साथ पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य को भी आगे बढ़ाया जा सकता है।
शाडू मिट्टी की प्रतिमाओं के लिए अलग क्षेत्र की मांग
भूमिपुत्र फाउंडेशन की ओर से मांग की गई है कि शाडू मिट्टी और अन्य पर्यावरणपूरक गणेश प्रतिमाओं के लिए गांवकी के पारंपरिक तालाबों में निर्धारित और सुरक्षित विसर्जन क्षेत्र बनाने की संभावनाओं पर विचार किया जाए।
इसके साथ ही पाटील ने नदियों और खाड़ियों में छोड़े जाने वाले सीवेज, औद्योगिक प्रदूषित पानी और कचरे के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की मांग की है।
परंपरा और पर्यावरण के बीच संतुलन पर जोर
सुशांत पाटील ने कहा कि गणेश विसर्जन से जुड़े नियम बनाते समय स्थानीय परिस्थितियों और परंपराओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। उनका सुझाव है कि पर्यावरणपूरक प्रतिमाओं के लिए सुरक्षित पारंपरिक विसर्जन व्यवस्था विकसित करने पर प्रशासन, स्थानीय ग्रामस्थ, गणेशोत्सव मंडल और पर्यावरण विशेषज्ञ मिलकर विचार करें।
इस बीच, वसई-विरार महानगरपालिका ने इस वर्ष पर्यावरणपूरक विसर्जन के लिए 128 कृत्रिम तालाब तैयार किए हैं और नागरिकों को इनका उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया है। डेढ़ दिन के विसर्जन में मनपा के अनुसार 12,987 प्रतिमाओं में से 11,974 का विसर्जन कृत्रिम तालाबों में हुआ।
इस तरह एक ओर प्रशासन पर्यावरण संरक्षण और निर्धारित विसर्जन व्यवस्था पर जोर दे रहा है, वहीं पाटील जैसे स्थानीय प्रतिनिधि पारंपरिक जलस्रोतों के संरक्षण और पर्यावरणपूरक प्रतिमाओं के लिए नियंत्रित विसर्जन व्यवस्था पर चर्चा की मांग कर रहे हैं।











