Siddaramaiah Political Journey: भारतीय राजनीति और खासकर कर्नाटक की सियासत में ‘सिद्धारमैया’ एक ऐसा नाम है, जिन्होंने अपनी जमीनी पकड़ और सामाजिक न्याय की राजनीति के दम पर शीर्ष मुकाम हासिल किया। एक साधारण किसान परिवार में जन्म लेने से लेकर देश के सबसे अमीर राज्यों में से एक (कर्नाटक) के मुख्यमंत्री बनने तक का उनका सफर बेहद प्रेरणादायक और संघर्षों से भरा रहा है।
साधारण शुरुआत: चरवाहे से वकील बनने तक का सफर
- जन्म और पृष्ठभूमि: सिद्धारमैया का जन्म मैसूर जिले के सिद्दारामनहुंडी गांव में एक बेहद साधारण किसान परिवार में हुआ था। बचपन में वे अपने परिवार की मदद के लिए मवेशी (भेड़-बकरियां) चराया करते थे।
- शिक्षा की राह: तमाम आर्थिक तंगियों के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय से पहले बी.एससी (B.Sc) और फिर बाद में कानून की डिग्री (LL.B) हासिल की और मैसूर में वकालत शुरू की।
राजनीतिक पारी का आगाज और ‘अहिंदा’ (AHINDA) आंदोलन
सिद्धारमैया ने 1970 के दशक के उत्तरार्ध में सक्रिय राजनीति में कदम रखा। वे समाजवादी विचारधारा से गहरे प्रभावित थे।
- पहला चुनाव: उन्होंने 1983 में लोक दल के टिकट पर चामुंडेश्वरी निर्वाचन क्षेत्र से अपना पहला विधानसभा चुनाव जीता। इसके बाद उन्होंने मुड़कर नहीं देखा।
- सामाजिक न्याय की आवाज: सिद्धारमैया कर्नाटक में ‘अहिंदा’ (AHINDA) यानी अल्पसंख्यक (Alpa-sankhyatar), पिछड़े वर्ग (Hindulidavar), और दलितों (Dalitar) के सबसे बड़े पैरोकार माने जाते हैं। उन्होंने इस बड़े सामाजिक गठबंधन को एकजुट करके अपनी मजबूत राजनीतिक जमीन तैयार की।
देवेगौड़ा का साथ और फिर कांग्रेस में एंट्री
एक समय में सिद्धारमैया पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवेगौड़ा के बेहद करीबी और जनता दल (सेक्युलर) के प्रमुख नेताओं में से एक थे। वे कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री भी रहे। लेकिन बाद में वैचारिक मतभेदों के चलते उन्होंने जद(एस) छोड़ दी।
- 2006 में कांग्रेस में शामिल: जद(एस) छोड़ने के बाद वे राहुल गांधी और सोनिया गांधी की मौजूदगी में कांग्रेस में शामिल हो गए। कांग्रेस के लिए उनका आना कर्नाटक में पार्टी को दोबारा जिंदा करने वाला साबित हुआ।
मुख्यमंत्री की कुर्सी और ‘भाग्य’ योजनाओं का दौर
साल 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की ऐतिहासिक जीत के बाद सिद्धारमैया पहली बार कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने।
- 5 साल का कार्यकाल पूरा किया: वे डी. देवराज अर्स के बाद कर्नाटक के इतिहास में पिछले कई दशकों में ऐसे पहले मुख्यमंत्री बने, जिन्होंने अपना 5 साल का कार्यकाल (2013-2018) सफलतापूर्वक पूरा किया।
- कल्याणकारी योजनाएं: अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने ‘अन्ना भाग्य’ (मुफ्त चावल), ‘क्षीर भाग्य’ (स्कूली बच्चों के लिए दूध) और ‘इंदीरा कैंटीन’ जैसी लोक-कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं, जिसने उन्हें गरीबों का मसीहा बना दिया।
विपक्ष के नेता से दोबारा सत्ता के शिखर तक
2018 के चुनावों के बाद, भले ही राज्य में राजनीतिक उथल-पुथल रही, लेकिन सिद्धारमैया विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (Leader of Opposition) के रूप में सरकार को घेरते रहे। उनकी बेबाक बयानबाजी और कड़क शैली के कारण वे हमेशा चर्चा में रहे। इसके बाद 2023 के चुनावों में उन्होंने डी.के. शिवकुमार के साथ मिलकर कांग्रेस को प्रचंड बहुमत दिलाया और एक बार फिर राज्य के मुख्यमंत्री की कमान संभाली।
निष्कर्ष: सिद्धारमैया की कहानी यह साबित करती है कि अगर इरादे मजबूत हों और जनता से जुड़ाव सच्चा हो, तो एक साधारण चरवाहा भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के सबसे ऊंचे शिखर पर पहुंच सकता है। आज भी 75 वर्ष से अधिक की उम्र में उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता और लोकप्रियता बरकरार है।





