ठाणे। ठाणे खाड़ी में प्रतिमा विसर्जन से पर्यावरण पर पड़ने वाले वास्तविक प्रभावों का वैज्ञानिक मूल्यांकन किए जाने की मांग अब जोर पकड़ने लगी है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि खाड़ी की जैव विविधता, जल गुणवत्ता, जलीय जीवों और प्रवासी पक्षियों पर विसर्जन के असर का वस्तुनिष्ठ एवं वैज्ञानिक अध्ययन आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है।
आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन की जरूरत

हर वर्ष गणेशोत्सव के दौरान पर्यावरण-अनुकूल उत्सव के नाम पर काली मिट्टी की प्रतिमाओं, कृत्रिम विसर्जन तालाबों और जनजागरण अभियानों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। हालांकि, इन उपायों से पर्यावरण को कितना वास्तविक लाभ हुआ और नागरिकों की भागीदारी कितनी बढ़ी, इसका कोई सार्वजनिक वैज्ञानिक आकलन अब तक सामने नहीं आया है। विशेषज्ञों का मानना है कि आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है।
काली मिट्टी की प्रतिमाएं: लाभ और चुनौतियां
विशेषज्ञों के अनुसार काली मिट्टी की प्रतिमाएं अपेक्षाकृत पर्यावरण-अनुकूल मानी जाती हैं, लेकिन हजारों प्रतिमाओं का एक साथ खाड़ी में विसर्जन होने से गाद की मात्रा बढ़ने, जल की गुणवत्ता प्रभावित होने तथा जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए नियमित निगरानी और वैज्ञानिक अध्ययन की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है।
ठाणे खाड़ी: प्रवासी पक्षियों का महत्वपूर्ण आवास

ठाणे खाड़ी को फ्लेमिंगो सहित अनेक प्रवासी पक्षियों का महत्वपूर्ण आवास क्षेत्र माना जाता है। ऐसे में पर्यावरणविदों ने संवेदनशील खाड़ी क्षेत्रों के लिए विशेष संरक्षण नीति बनाने, कृत्रिम विसर्जन तालाबों को बढ़ावा देने, घरेलू विसर्जन को प्रोत्साहित करने तथा प्रतिमा पुनर्चक्रण जैसी व्यवस्थाओं को और अधिक प्रभावी बनाने की मांग की है।
मुख्यमंत्री को सौंपा गया ज्ञापन
पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. प्रशांत सिनकर ने बताया कि प्रतिमा विसर्जन के पर्यावरणीय प्रभावों का स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन कराए जाने के लिए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को ज्ञापन सौंपा गया है। उनका कहना है कि आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखते हुए ठाणे खाड़ी की जैव विविधता का संरक्षण करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
विशेषज्ञों की प्रमुख मांगें:
- ठाणे खाड़ी में प्रतिमा विसर्जन का वैज्ञानिक ऑडिट
- जल गुणवत्ता और जैव विविधता का नियमित अध्ययन
- पर्यावरण-अनुकूल उपायों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन
- कृत्रिम विसर्जन तालाबों और घरेलू विसर्जन को बढ़ावा
- संवेदनशील खाड़ी क्षेत्रों के लिए विशेष संरक्षण नीति
पर्यावरण विशेषज्ञों का स्पष्ट मत है कि “दिखावटी पर्यावरणवाद नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित निर्णय ही समय की मांग है।”







