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पालघर में विकास के दावों की खुली पोल: सड़क न होने से घायल युवक को 1 किमी डोली में ले जाने को मजबूर हुए ग्रामीण |

July 30, 2026 3:09 PM
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पालघर/डहाणू: पालघर जिले के गठन को 12 साल पूरे होने जा रहे हैं, लेकिन जिले के दूर-दराज के आदिवासी इलाकों में बुनियादी सुविधाओं की बदहाली आज भी जस की तस है। डहाणू तालुका के रायतली-चांदवड स्थित डोंगरीपाड़ा से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने प्रशासनिक दावों की हवा निकाल दी है। यहाँ पक्की सड़क और पुलिया न होने के कारण पेड़ से गिरकर गंभीर रूप से घायल एक युवक को ग्रामीणों को करीब एक किलोमीटर तक डोली में उठाकर मुख्य सड़क तक पहुंचाना पड़ा।

3 साल से अधूरी पड़ी है पुलिया, एम्बुलेंस तक नहीं पहुंच सकी घटना 23 जुलाई की सुबह की है, जब स्थानीय निवासी करण देसक पेड़ से गिरकर बुरी तरह घायल हो गए। परिजनों ने तुरंत एम्बुलेंस को फोन किया, लेकिन गांव तक जाने वाले रास्ते पर पुलिया (मोरी) का निर्माण पिछले तीन सालों से अधूरा पड़ा होने के कारण एम्बुलेंस गांव के अंदर नहीं आ सकी। मजबूरी में ग्रामीणों ने लकड़ी और कपड़े से डोली बनाई और घायल करण को उसमें बैठाकर 1 किलोमीटर पैदल चलकर मुख्य सड़क तक लाए। इसके बाद उन्हें डहाणू कॉटेज अस्पताल ले जाया गया, जहाँ प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें बेहतर इलाज के लिए वेदांत अस्पताल रेफर कर दिया गया।

पहले भी जा चुकी है जान, ग्रामीणों ने दी आंदोलन की चेतावनी ग्रामीणों का गुस्सा इस बात को लेकर है कि वे इस अधूरी पुलिया को बनवाने के लिए ग्राम पंचायत को 10 से अधिक बार लिखित आवेदन दे चुके हैं, लेकिन अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही। स्थानीय नागरिक दिनेश शिंगाडा ने बताया कि इससे पहले भी दो मरीजों को इसी तरह डोली के सहारे अस्पताल पहुंचाना पड़ा था, जबकि 4 साल पहले समय पर इलाज न मिलने से गांव के एक व्यक्ति की मौत तक हो चुकी है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही पुलिया का निर्माण पूरा नहीं हुआ, तो वे उग्र आंदोलन और आमरण अनशन करने को बाध्य होंगे।

‘आदर्श आदिवासी गांव’ योजना पर उठे गंभीर सवाल सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस गंजाड-रायतली-घोलवड क्षेत्र की यह घटना है, उसे आदिवासी विकास विभाग ने “आदर्श आदिवासी गांव” योजना में शामिल किया हुआ है। कागजों पर ‘आदर्श’ घोषित इस इलाके में मरीजों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और स्कूली बच्चों को रोज जान जोखिम में डालकर आना-जाना पड़ता है। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जमीनी हकीकत सरकारी विज्ञापनों और दावों से कोसों दूर है।

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