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2 साल बाद जागा प्रशासन: 77 वर्षीय बुजुर्ग आदिवासी के धरने के आगे झुका तंत्र, आखिरकार एक्टिव हुआ आधार कार्ड |

September 2, 2026 3:18 PM
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वसई (पालघर): अपने हक के लिए 77 साल की उम्र में भी संघर्ष की मशाल जलाए रखने वाले एक बुजुर्ग आदिवासी मजदूर को आखिरकार न्याय मिल ही गया। पिछले दो वर्षों से बंद पड़े अपने आधार कार्ड को दोबारा चालू कराने के लिए वसई तहसील कार्यालय के बाहर हाथ में राजदंड लेकर धरने पर बैठे जयराम वळवी के आंदोलन के बाद प्रशासनिक अमला हरकत में आया और उनकी समस्या का त्वरित समाधान किया गया।

2 साल तक सरकारी दफ्तरों के काटे चक्कर वसई तालुका के मेढे गांव के रहने वाले 77 वर्षीय जयराम वळवी का आधार कार्ड पिछले दो सालों से डिएक्टिवेट (अमान्य) पड़ा था। आधार कार्ड निष्क्रिय होने की वजह से उन्हें कई सरकारी सुविधाओं और अपने अधिकारों से वंचित होना पड़ रहा था। इस समस्या के समाधान के लिए बुजुर्ग जयराम ने वसई तहसील दफ्तर से लेकर पालघर जिला कलेक्ट्रेट तक के अनगिनत चक्कर काटे, लेकिन हर बार उन्हें केवल आश्वासन और निराशा ही हाथ लगी।

तहसील दफ्तर में बेटों संग दिया धरना लगातार उपेक्षा से तंग आकर सोमवार को जयराम वळवी अपने दो बेटों के साथ वसई तहसील कार्यालय पहुंचे। हाथ में पारंपरिक राजदंड थामे बुजुर्ग ने साफ ऐलान कर दिया कि जब तक उनका काम नहीं होगा, वे यहां से नहीं उठेंगे। बुजुर्ग आदिवासी के इस दृढ़ निश्चय और तहसील दफ्तर में शुरू हुए धरने की खबर से प्रशासनिक अधिकारियों में हड़कंप मच गया।

तहसीलदार की पहल से मंगलवार सुबह चालू हुआ आधार मामले की गंभीरता को देखते हुए वसई के तहसीलदार ने तुरंत हस्तक्षेप किया। उन्होंने राज्यस्तरीय आधार प्राधिकरण (UIDAI टीम) से संपर्क साधकर मामले का लगातार फॉलोअप लिया। प्रशासन के इस त्वरित समन्वय का नतीजा यह रहा कि मंगलवार सुबह करीब 10 बजे—दो साल के लंबे इंतजार के बाद—जयराम वळवी का आधार कार्ड आखिरकार दोबारा सक्रिय (Active) हो गया।

श्रमजीवी संगठन ने व्यवस्था पर उठाए सवाल इस पूरे घटनाक्रम पर ‘श्रमजीवी संगठन’ ने गहरा दुख और चिंता व्यक्त की है। संगठन के प्रतिनिधियों ने कहा कि कभी वेठबिगारी (बंधुआ मजदूरी) के चंगुल से आजाद हुए एक 77 साल के बुजुर्ग आदिवासी को अपना जायज अधिकार पाने के लिए दो साल तक दर-दर भटकना पड़ा और अंत में धरने पर बैठना पड़ा, यह हमारी प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यशैली पर बड़ा सवालिया निशान है। यह घटना साबित करती है कि आज भी अधिकारों को हासिल करने के लिए आम जनता को संघर्ष का ही रास्ता अपनाना पड़ता है।

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